क्यों लिखती हूँ, क्या लिखती हूँ, कोई न जाने,
बस चाहत है कि दुनिया मुझे पहचाने।
क्यों किसी को कोई यूँ ही भाता है?
क्यों कोई औरों पर ही मर मिट जाता है?
खुद को तराशने की चाह किसी में क्यों नहीं होती?
सबको बस शरारती सिक्कों की ही चाह क्यों होती?
एक राधा, एक मीरा और एक कृष्ण वासुदेव,
मगर क्यों ये स्त्रियाँ और ये माएँ—
हो जाती हैं खुद राधा और देखती हैं बच्चों में अपना कान्हा ?
क्यों कहीं कुछ सवाल नहीं होता ?
फिर इजहार भी तो नहीं होता !

शानदार भावपूर्ण रचना
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