तालाब और कुएं की शादी!
झारखंड के गांव का अनोखा रिवाज
पीपल के पेड़ बना गवाह
पूरा गांव बना बाराती!
बाघमारा (धनबाद) । जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना! यहां तालाब की शादी होती है… वो भी दूल्हा-दुल्हन, बारात, फेरे और पूरा विधि-विधान के साथ! वर पक्ष, वधु पक्ष, महिलाएं-पुरुष सब एक साथ। और गवाह? न सिर्फ सैकड़ों ग्रामीण, बल्कि गांव का विशाल पीपल का पेड़ भी!
झारखंड के बाघमारा प्रखंड के महूदा पंचायत अंतर्गत महूदा बस्ती में मंगलवार को एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जो दिल को छू गया। सूंड़ी बाँध (तालाब) और उसके बगल वाले कुएं की शादी हो गई!
पुजारी ने पूरे रीति-रिवाज से विवाह संस्कार संपन्न कराया। सुरेश राय और उनकी पत्नी बसंती देवी ने वर-वधु पक्ष की भूमिका निभाई।
शादी की रस्में बड़े उत्साह से हुईं। महिलाओं ने वर (तालाब) का पवित्र जल लाकर वधु (कुआँ) में डाला। दोनों को लाल डोर से बांधा गया। मंत्रोच्चारण, कलश चढ़ाना, फेरे… सब कुछ ठीक वैसे ही जैसे किसी इंसानी शादी में होता है। शादी के बाद पूरा गांव सामूहिक भोज में शामिल हुआ।
ग्रामीणों ने बताया कि यह सदियों पुरानी परंपरा है। जिस तालाब-कुएं की शादी नहीं होती, उसके पानी को अशुभ माना जाता है। शादी के बाद तालाब का शुद्धिकरण किया जाता है और फिर उसी पानी से गांव के यज्ञ, शादी-ब्याह, पूजा-अनुष्ठान शुरू होते हैं। यह परंपरा न सिर्फ जल संरक्षण की मिसाल है, बल्कि प्रकृति के साथ गांव की गहरी भावनात्मक जुड़ाव को भी दर्शाती है।
“तालाब और कुँवा हमारे परिवार की तरह हैं। आज हमने इन्हें पति-पत्नी बना दिया। अब इनका पानी पवित्र हो गया है। गांव की खुशहाली इसी से बंधी है।”
_बसंती देवी, स्थानीय ग्रामीण
“पूर्वजों की यह परंपरा हम निभा रहे हैं। बिना शादी के तालाब का पानी किसी शुभ काम में नहीं लगता। आज पूरा गांव गवाह बना है।”
_सुरेश राय, स्थानीय ग्रामीण
“हम सबने बारात की तरह खुशियां मनाईं। पीपल के पेड़ के नीचे शादी हुई। दोनों एक हो गए… अब पानी कभी कम नहीं होगा!”
_ग्रामीण महिला
“पूरी विधि से शादी कराई। वर-वधु को डोर बांधा, जल कलश चढ़ाया। प्रकृति को पूजने की यही हमारी संस्कृति है।”
_मधुसूदन पाण्डेय, पुजारी
यह अनोखी शादी न सिर्फ महूदा बस्ती, बल्कि पूरे बाघमारा क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बन गई है। ग्रामीण इसे “प्रकृति संरक्षण की जीती-जागती मिसाल” बता रहे हैं।
