बरगी बांध : "बेटा, डरो मत, माँ है ना साथ।"

बरगी बांध : "बेटा, डरो मत, माँ है ना साथ।"

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बरगी बांध : "बेटा, डरो मत, माँ है ना साथ।"
मध्य प्रदेश का जबलपुर,  
नदी की गोद में
बरगी बांध की लहरों में 
आज कोई स्पंदन नहीं है।

लहरें थक गईं, कीचड़ चुप हो गया,
समय रुक सा गया उस आलिंगन पर।
लाल जैकेट में लिपटी ममता,
और नीली टी-शर्ट में सोया बचपन।

समय के कुछ फासले पर
जहाँ बरगी की लहरों के साथ
मां की ममता और मासूम बचपन 
अठखेलियाँ और परस्पर सपने बुन रहा था।
वहां अब सिर्फ अनबुझ सन्नाटा और दर्द की असीम गहराइयां है।
बरगी की लहरों ने इंसानी फितरत ओढ़,
कुत्सित चाल चल नदी में समा चुकी है?

और छोड़ दिया है..
मां के माथे पर घाव, होंठों पर पानी,
फिर भी आँखें बंद कर मानो अपने लाल को भरोसा दे रही हो।
जैसे कह रही हो—
"बेटा, डरो मत, माँ है ना साथ।"

एक माँ, अपने चार साल के बच्चे को सीने से चिपकाए।  
और उस अबोध बालक का मां के सीने से लग सुरक्षा का अटूट विश्वास और अह्सास भरा मां का आलिंगन 
जैसे पूरे ब्रह्मांड को थाम लिया हो।

गंदे पानी में फूल तैर रहे थे,  
जैसे श्रद्धांजलि दे रहे हों उस ममता को।  
माँ ने आखिरी साँस तक बेटे को नहीं छोड़ा।

बरगी बांध के किनारे,  
सुबह जब दोनों के शव मिले,  
वहाँ मौजूद हर आँख नम थी।  
कोई शब्द नहीं थे, सिर्फ भारी खामोशी और रोते दिल थे।  

माँ का हाथ अभी भी बेटे की कमर पर था,  
बेटे का सिर माँ की छाती में छिपा हुआ।  
दोनों एक-दूसरे में समाए,  
जैसे कह रहे हों — "हम साथ हैं, हमेशा साथ।"

हे बरगी, तेरी लहरों ने एक परिवार उजाड़ दिया,  
एक माँ आखिरी जंग हार गई।  
पर ये तस्वीर सदियों तक याद रहेगी—  
माँ की ममता मौत से भी बड़ी होती है।

_ गुड्डू भैया 

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