मंत्री इरफान के खिलाफ पत्रकारों का आक्रोश!
2 मई को काला बिल्ला लगाकर करेंगे मार्च
सार्वजनिक माफी की मांग
बोकारो। हजारीबाग में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी से सवाल पूछने पर दो पत्रकारों के साथ की गई निर्लज्ज मारपीट की घटना ने पूरे झारखंड के पत्रकार समुदाय को भड़का दिया है।
बोकारो के पत्रकारों ने इस घटना की तीखी निंदा करते हुए स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी से सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि माफी नहीं मांगी गई और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन और भी उग्र रूप लेगा।
इस संबंध में बुधवार को बोकारो सर्किट हाउस में पत्रकारों की बैठक हुई। बैठक में एक स्वर में फैसला लिया गया कि अब पत्रकार चुप नहीं रहेंगे। आंदोलन के पहले चरण के रूप में 2 मई को सभी पत्रकार काला बिल्ला लगाकर जोरदार प्रोटेस्ट मार्च निकालेंगे। यह मार्च डीसी कार्यालय पहुंचकर मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपेगा।
पत्रकारों ने साफ कहा कि मंत्री इरफान अंसारी को अपनी गलती स्वीकार कर सार्वजनिक माफी मांगनी होगी। साथ ही राज्य सरकार को तुरंत पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करना चाहिए, वरना पूरे राज्य में पत्रकारों का आक्रोश और बढ़ेगा।
बैठक में पत्रकारों ने कहा कि पत्रकार समाज के मुद्दों को उजागर करने का काम करता है, न कि मार खाने के लिए। हजारीबाग में जो कुछ हुआ, वह निंदनीय, शर्मनाक और असहनीय है। अगर सत्ता के लोग सवालों से इतना चिढ़ते हैं, तो लोकतंत्र खतरे में है।
पत्रकारों ने मांग की कि हजारीबाग प्रकरण में शामिल सभी आरोपियों, चाहे वे मंत्री के करीबी हों या नहीं, उनके खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अब और सब्र नहीं। अगर सरकार और मंत्री ने पत्रकारों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई तो वे और भी मजबूती से सड़क पर उतरेंगे।
पत्रकार सुरक्षा कानून क्या है ?
पत्रकार सुरक्षा कानून (Journalist Protection Act / पत्रकार सुरक्षा अधिनियम) एक विशेष कानून की मांग है, जिसका उद्देश्य पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को काम के दौरान हिंसा, धमकी, हमला, प्रताड़ना या उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना है।
यह कानून मुख्य रूप से दो तरह की सुरक्षा देता है:
1. शारीरिक सुरक्षा — पत्रकार पर हमला करने, धमकी देने या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर त्वरित और सख्त कार्रवाई।
2. व्यावसायिक सुरक्षा — पत्रकारिता के कार्य में बाधा डालने, झूठे मुकदमे दर्ज करने या दबाव बनाने से बचाव।
यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (प्रेस) को मजबूत करने के लिए बनाया जाता है, ताकि पत्रकार बिना डर के सवाल पूछ सकें और जनहित के मुद्दों को उजागर कर सकें।
भारत में स्थिति
- भारत में केंद्र स्तर पर अभी कोई अलग से पत्रकार सुरक्षा कानून नहीं है।
- संसद में कुछ सांसदों द्वारा “The Journalist (Prevention of Violence and Damage or Loss to the Property) Bill, 2022” जैसा प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया गया था, लेकिन यह अभी कानून नहीं बना है।
- केंद्र सरकार ने 2017 में राज्यों को पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एडवाइजरी जारी की थी, लेकिन यह बाध्यकारी नहीं है।
राज्यों में क्या है ?
कुछ राज्यों ने अपना अलग कानून बनाया है_
- छत्तीसगढ़ : सबसे मजबूत मॉडल माना जाता है। 2023 में छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा अधिनियम लागू हुआ (महाराष्ट्र के बाद दूसरा राज्य)।
- इसमें पत्रकार पर हमला/धमकी को गैर-जमानती अपराध बनाने का प्रावधान है।
- त्वरित जांच, विशेष समिति का गठन, सुरक्षा योजना आदि शामिल हैं।
- महाराष्ट्र : पहले राज्य के रूप में इस तरह का कानून बनाया।
- झारखंड : अभी तक कोई अलग पत्रकार सुरक्षा कानून लागू नहीं है।
झारखंड में मांग क्यों तेज है ?
झारखंड में पत्रकार संगठन (जैसे झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन - JJA, भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ आदि) लंबे समय से छत्तीसगढ़ मॉडल के तर्ज पर पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग कर रहे हैं।
हाल की घटनाओं (जैसे हजारीबाग में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी से जुड़ी मारपीट) के बाद यह मांग और तेज हो गई है। पत्रकारों की मुख्य मांगें हैं:
- पत्रकार पर हमला/धमकी को गैर-जमानती और cognizable अपराध घोषित किया जाए।
- हमले की शिकायत पर 24 घंटे के अंदर FIR दर्ज होना चाहिए और जांच में तेजी की मांग।
- एक पत्रकार सुरक्षा समिति का गठन, जिसमें पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधि भी हों।
- धमकी मिलने पर त्वरित सुरक्षा मुहैया कराना।
- पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा भी जुड़ी मांगें।
कानून में आमतौर पर क्या-क्या प्रावधान होते हैं ?
(छत्तीसगढ़ कानून के आधार पर)
- हिंसा या धमकी पर 1-3 साल तक की सजा और जुर्माना।
- हमले की जानकारी मिलते ही पुलिस को तुरंत कार्रवाई करने की बाध्यता।
- पत्रकारों के लिए विशेष सुरक्षा योजना।
- फर्जी मुकदमों से बचाव के लिए कुछ प्रक्रियाएं।
- स्रोत की गोपनीयता की रक्षा (हालांकि पूर्ण शील्ड लॉ अभी नहीं है)।
हालांकि प्रेस कार्ड कोई विशेष कानूनी इम्यूनिटी (छूट) नहीं देता। पत्रकार भी सामान्य नागरिक की तरह कानून के अधीन है, लेकिन उसके काम को बाधित करने पर विशेष सुरक्षा का प्रावधान किए जाने की मांग पत्रकार बिरादरी द्वारा समय-समय की जाती रही है।
