'राम' नहीं 'परशुराम' हूं मैं_ जयंती विशेष

'राम' नहीं 'परशुराम' हूं मैं_ जयंती विशेष

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परशुराम जयंती पर निकली शोभायात्रा

ब्राह्मण धर्मशाला का भूमिपूजन सम्पन्न 

पाकुड़। परशुराम जयंती के अवसर पर ब्राह्मण महासभा पाकुड़ के तत्वावधान में शहर में भव्य शोभायात्रा निकाली गई। स्वस्तिवाचन के साथ नित्य काली मंदिर से शुरू हुई यह यात्रा श्मशान काली मंदिर, मदपाड़ा और बिरसा चौक होते हुए पुनः नित्य काली मंदिर पहुंचकर संपन्न हुई।

इसके बाद रानी ज्योतिमोई ब्राह्मण धर्मशाला के निर्माणाधीन स्थल पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई तथा ब्राह्मण भोज का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने भाग लिया।


“भगवान परशुराम का जन्मोत्सव समाज और विश्व के कल्याण के लिए मनाया जाता है। ब्राह्मण समाज सदैव सभी के हित और सुख की कामना करता है तथा धर्म की विजय और अधर्म के नाश की कामना करता है।”  
_भागीरथ तिवारी, जिला अध्यक्ष, ब्राह्मण महासभा पाकुड़

कार्यक्रम में भागीरथ तिवारी, विभाष मिश्रा, संजय कुमार शुक्ला, कैलाश झा, मनीष राज चौबे, डॉली पांडे, प्राची चौधरी, बमभोला उपाध्याय, पूनम देवी, बेला मजूमदार, कमला गांगुली सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।

परशुराम जयंती का महत्व
परशुराम जयंती हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है।

भगवान परशुराम कौन हैं ?
भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। उन्हें परशु (फरसा) धारण करने के कारण परशुराम कहा जाता है। वे ब्राह्मण कुल में जन्मे थे, लेकिन क्षत्रिय जैसे योद्धा गुणों से युक्त थे। वे चिरंजीवी (अमर) माने जाते हैं और कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रहने वाले सात चिरंजीवियों में से एक हैं।

भगवान परशुराम ने पृथ्वी पर फैले अनाचार, अन्याय और दुष्ट क्षत्रिय राजाओं का २१ बार संहार किया। इसका उद्देश्य था — धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश। इस त्योहार के माध्यम से हमें सिखाया जाता है कि सत्य और न्याय की रक्षा के लिए किसी भी स्तर तक संघर्ष करना चाहिए।

ब्राह्मण-योद्धा का आदर्श
वे ब्राह्मण थे, लेकिन शस्त्र धारण कर धर्म की रक्षा करते थे। इससे पता चलता है कि ज्ञान और शक्ति का समन्वय ही सच्चा धर्म है। ब्राह्मण समाज इस दिन विशेष रूप से अपने कर्तव्य, विद्या और समाज-सेवा की शपथ लेता है।

किंवदंती है कि परशुराम जी ने अपना परशु समुद्र में फेंककर भूमि निकाली, जिससे कोकण, केरल, गोवा आदि क्षेत्र बने। इससे पर्यावरण संरक्षण और भूमि की पवित्रता का संदेश मिलता है। 

पाकुड़ और देश के अन्य हिस्सों में ब्राह्मण समाज द्वारा मनाया जा रहा, यह त्योहार समाज और विश्व कल्याण की कामना से जुड़ा है। इसमें ब्राह्मण भोज, पूजा-अर्चना और शोभायात्रा का आयोजन होता है, जो समाज में एकता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

परशुराम जयंती हमें याद दिलाती है कि_
   - क्रोध को भी सकारात्मक रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है (धर्म रक्षा के लिए)।
   - गुरु भक्ति और माता-पिता की आज्ञा पालन सबसे बड़ा धर्म है।
   - सनातन धर्म सदैव विजयी होता है।

परशुराम जयंती केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा, न्याय और कर्तव्य का त्योहार है। यह हमें सिखाता है कि जब अधर्म बढ़ता है, तो भगवान स्वयं अवतार लेकर संतुलन स्थापित करते हैं।

इस दिन ब्राह्मण समाज के साथ-साथ समस्त हिंदू समाज पूजा-पाठ, दान-पुण्य और सत्संग करता है।

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