लोहार जाति: यूपी में सत्ता की दहलीज तक, बिहार में क्यों हाशिए पर ?

लोहार जाति: यूपी में सत्ता की दहलीज तक, बिहार में क्यों हाशिए पर ?

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लोहार जाति: यूपी में सत्ता की दहलीज तक, बिहार में क्यों हाशिए पर ?

बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों की हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों- UP मंत्रिमंडल विस्तार में लोहार/विश्वकर्मा समुदाय के राजहंस विश्वकर्मा को मंत्री पद दिए जाने और वहीं दूसरी तरफ बिहार के मंत्रिमंडल विस्तार में मल्लाह, धानुक, गंगोता (0.49%), कहार, कानू, सूड़ी, कलवार को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिए जाने और इस पूरे परिदृश्य में लोहार जाति का 'अति-अदृश्य' दिखना एक गंभीर राजनीतिक-सामाजिक सवाल भी वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में खड़े करता है।
भारतीय लोकतंत्र में जातीय गणित राजनीति की रीढ़ है। उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों ही हिंदी पट्टी के बड़े राज्य, जहां पिछड़ी और अति-पिछड़ी (EBC) जातियों की आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है। लेकिन लोहार समुदाय का अनुभव दोनों राज्यों में अलग-अलग रहा है। 
यूपी में यह समुदाय OBC के रूप में राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल कर सत्ता तक पहुंचा, जबकि बिहार में EBC श्रेणी में बंटी हुई पहचान, पहचान के विवाद और बड़े EBC समूहों के बीच दब जाने के कारण वह हाशिए पर रहा। 
बिहार के 2023 जाति सर्वेक्षण और ऐतिहासिक आंकड़े इस असमानता की कहानी बयां करते हैं।

जनसंख्या का गणित: संख्या समान, लेकिन प्रतिशत में फर्क
उत्तर प्रदेश 
लोहार समुदाय की अनुमानित आबादी लगभग 21 लाख। 
UP की कुल आबादी 24 करोड़ के करीब होने से यह 0.9% के आसपास है, लेकिन OBC के अंदर स्थानीय स्तर पर प्रभावी। 
वे व्यापक रूप से फैले हुए हैं और विश्वकर्मा/पांचाल जैसे उपनामों से भी जाने जाते हैं।

बिहार
लोहार समुदाय की अनुमानित आबादी लगभग 21 लाख, लेकिन 2023 जाति सर्वेक्षण में लोहार को EBC में बहुत छोटा प्रतिशत (कुल आबादी का 0.63% या उससे कम कुछ रिपोर्ट्स में) दिखाया गया। 
कुल EBC 36.01% (करीब 4.7 करोड़) है, जिसमें 112 जातियां हैं। 
तेली (2.81%), मल्लाह (2.60%), 
कानू (2.21%), धानुक (2.14%), नोनिया (1.91%), कहार (1.64%), नाई (1.59%) और बढ़ई (1.45%) आदि अन्य  EBC जातियां बड़ी हैं।

बिहार में लोहार 1.60 % तक बताए जाते हैं कुछ पुरानी रिपोर्ट्स में, लेकिन सर्वे में पहचान विवाद (Lohar vs Lohara/Lohra vs Kamar) ने आंकड़ों को प्रभावित किया। कई इलाकों में समुदाय ने सर्वे का बहिष्कार किया।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व_ यूपी vs बिहार
उत्तर प्रदेश में
- लोहार/OBC Artisan समुदाय BSP, SP और BJP जैसी पार्टियों में जगह बनाता रहा। OBC राजनीति (मंडल युग) ने इन्हें मुख्यधारा में लाया।
- यूपी में विश्वकर्मा/लोहार समुदाय के लोग स्थानीय स्तर पर MLAs, पंचायत प्रतिनिधि और संगठनात्मक पदों पर पहुंचे। BJP और SP दोनों ने Artisan castes को टिकट दिए। UP की OBC लिस्ट में Lohar स्पष्ट रूप से शामिल है।
- बड़े OBC (यादव, कुर्मी आदि) के साथ गठबंधन या स्वतंत्र assertion में लोहार जैसी छोटी जातियां भी लाभ उठाती हैं क्योंकि UP की राजनीति में बहु-जातीय गठबंधन आम हैं।

बिहार में
- EBC (36%) सबसे बड़ा समूह है, लेकिन अत्यधिक खंडित। नीतीश कुमार की JD(U) ने EBC को अपना वोट बैंक बनाया, लेकिन लाभ मुख्य रूप से तेली, धानुक, कहार, मल्लाह, नाई, नोनिया, बढ़ई जैसी 1-3% वाली जातियों को मिला।
- 2020 में EBC MLAs की संख्या 29 (10%+) पहुंचे, जो पहले बहुत कम (6-16) थे। लेकिन लोहार जैसे छोटे समूहों का प्रतिनिधित्व नगण्य रहा।
- मंत्रिमंडल में EBC को 12% पद मिले, जबकि आबादी 36%। NDA और महागठबंधन दोनों EBC टिकट कम देते हैं (NDA ने हालिया चुनावों में सिर्फ 15 % EBC उम्मीदवार)।

लोहार बिहार में EBC में हैं, लेकिन ST बनने की कोशिश (2016 नोटिफिकेशन) सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी (2022)। Lohar को Lohara (ST) से अलग माना गया। इससे आरक्षण और पहचान का विवाद बढ़ा।

सरकारों की सोच और रणनीति
उत्तर प्रदेश 
मंडल कमीशन के बाद OBC assertion मजबूत। BJP ने भी non-Yadav OBC/EBC को जोड़ा। Artisan castes (लोहार, सुनार आदि) को विकास योजनाओं (कौशल, MSME) और टिकटों से जोड़ा गया। छोटी जातियां बड़े गठबंधनों में जगह पाती हैं।

बिहार 
Nitish Kumar ने EBC को "साइलेंट वोटर" के रूप में देखा और 2005 से विशेष ध्यान दिया (पंचायत आरक्षण, EBC सब-कैटेगरी)। लेकिन 112 EBC जातियों में "जितनी आबादी, उतनी हिस्सेदारी" लागू करना मुश्किल। बड़े EBC जातियां मल्लाह, तेली, धानुक या कहार जैसे समुदाय हावी रहते हैं। लोहार जैसी छोटी कारीगर जातियां दब जाती हैं।

बिहार में EBC fragmentation ज्यादा है। Yadav (14.26%) जैसे OBC पहले से हावी, EBC में भी कुछ ही जातियां (धानुक, कानू, तेली, मल्लाह, कहार आदि) विधायक/मंत्री बन पाती हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं ?
- बिहार जाति सर्वे: EBC 36%, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व असमानुपातिक। Upper castes (15.5%) अभी भी over-represented कई क्षेत्रों में।
- UP में OBC राजनीति ज्यादा inclusive छोटी जातियों के लिए, क्योंकि SP-BSP-BJP त्रिकोण में गठबंधन विविधता लाते हैं।
- लोहार बिहार में ST vs EBC विवाद से ऊर्जा खो चुका है जबकि UP में स्थिर OBC स्थिति है।

संख्या पर्याप्त नहीं, संगठन और गठबंधन जरूरी
लोहार जाति यूपी में इसलिए बेहतर प्रतिनिधित्व पाती है क्योंकि वहां OBC पॉलिटिक्स में Artisan समूहों को जगह मिली, जबकि बिहार में EBC का विशाल लेकिन खंडित स्वरूप छोटी जातियों को दबाता है। Nitish की EBC नीति ने कुछ को उठाया, लेकिन लोहार जैसे समूह अभी भी संघर्षरत हैं।

2025 के चुनावों में EBC वोट निर्णायक रहा, मगर लोहार समुदाय संगठित होकर बड़े EBC क्लस्टर (मल्लाह और कारीगर समूह जातियों/समुदायों, यहां तो कभी विश्वकर्मा में गिने जानेवाले कारीगर जातियां- कसेरा/ठठेरा समुदाय ने खुद को 2023 के जातिगत सर्वे में
बनिया जातीय समूह में पूर्णत: स्थापित कर लिया है।) या पार्टियों के साथ negotiate करता, तो बदलाव संभव था। लेकिन, गणित में संख्या होने के बावजूद सत्ता से बहुत दूर ही रहा।

बिहार में लोहारों की यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति EBC राजनीति की संरचनात्मक समस्या से इतर, एसटी आरक्षण बनाम ईबीसी स्टेटस का दशकों पुराना अंतर्द्वंद्व, 2023 जाति सर्वे का व्यापक बहिष्कार, लोहरा/लोहारा और कमार (लोहार-कर्मकार) में बंटवारा तथा सामुदायिक नेतृत्व का गंभीर अभाव है — जहां “अति-पिछड़ा” या "आदिवासी" होने का मतलब अक्सर “अति-खंडित” और राजनीतिक रूप से "अति-अदृश्य" होना भी होता है।

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