राष्ट्रीय लोक अदालत का भव्य आयोजन
74 हजार से अधिक मामलों का निपटारा
12.46 करोड़ रुपये की वसूली
गिरिडीह। जिला विधिक सेवा प्राधिकार, गिरिडीह द्वारा व्यवहार न्यायालय परिसर में राष्ट्रीय लोक अदालत का सफल आयोजन किया गया। इस एक दिवसीय लोक अदालत में 74 हजार से अधिक मामलों का निपटारा कर न्याय व्यवस्था की नई मिसाल पेश की गई।
अदालत में कुल 71,654 प्री-लिटिगेशन मामलों और 3,004 लंबित मामलों का निष्पादन हुआ। इससे 12 करोड़ 46 लाख 93 हजार 739 रुपये की राजस्व वसूली हुई।
खास बातें_
- झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सह झालसा के कार्यकारी अध्यक्ष सुजीत नारायण प्रसाद ने कार्यक्रम का ऑनलाइन उद्घाटन किया।
- दुर्घटना वाद के पीड़ितों को 1.34 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि के चेक वितरित किए गए।
- 13 अलग-अलग पीठों का गठन कर विभिन्न प्रकार के आपराधिक चेक बाउंस, मोटर दुर्घटना, श्रम विवाद, पारिवारिक मामलों आदि का त्वरित निपटारा किया गया।
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह लोक अदालत के अध्यक्ष श्री मार्तंड प्रताप मिश्रा ने कहा कि लोक अदालत त्वरित, सुलभ और सस्ता न्याय दिलाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे अदालतों पर लंबित मामलों का बोझ कम होता है और आमजन को बिना खर्च के तुरंत न्याय मिलता है।
कार्यक्रम में न्यायिक पदाधिकारी, अधिवक्तागण, विभिन्न विभागों के अधिकारी तथा बड़ी संख्या में आम नागरिक उपस्थित रहे।
यह राष्ट्रीय लोक अदालत जिला विधिक सेवा प्राधिकार, गिरिडीह की पहल को मजबूती प्रदान करती है, जहां विवादों को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने पर जोर दिया जाता है।
लोक अदालत न केवल न्याय की गति को तेज करती है, बल्कि सामाजिक सद्भाव और विश्वास को भी मजबूत करती है।
लोक अदालत के लाभ जानें_
लोक अदालत न्याय व्यवस्था की एक अनूठी और लोकप्रिय अवधारणा है, जो भारतीय न्यायिक प्रणाली को आम जनता के लिए सुलभ, सस्ता और तेज बनाने का प्रभावी माध्यम है। यह वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) का सबसे सफल रूप है।
त्वरित न्याय (Speedy Justice)
- पारंपरिक अदालतों में मुकदमे सालों-दशकों तक चलते रहते हैं, लेकिन लोक अदालत में एक ही दिन में मामलों का निपटारा हो जाता है।
- इससे पक्षकारों का समय, ऊर्जा और मानसिक तनाव बचता है।
न्यूनतम खर्च (Extremely Low Cost)
- लोक अदालत में कोई कोर्ट फीस नहीं लगती।
- वकीलों की फीस भी बहुत कम या न के बराबर होती है क्योंकि मामले समझौते से निपट जाते हैं।
- गरीब, किसान, मजदूर और आम नागरिक आसानी से न्याय पा सकते हैं।
पक्षकारों के बीच समझौता एवं सद्भाव (Amicable Settlement)
- लोक अदालत में फैसला न्यायाधीश द्वारा थोपा नहीं जाता, बल्कि दोनों पक्षों की सहमति से होता है।
- इससे दुश्मनी कम होती है और सामाजिक संबंध बने रहते हैं, खासकर पारिवारिक, पड़ोसी और व्यापारिक विवादों में।
अदालतों पर बोझ कम होना (Reduction in Case Backlog)
- भारत में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। लोक अदालत इनमें से बड़ी संख्या में मामलों को एक साथ निपटा देती है।
- उदाहरण: गिरिडीह की हालिया लोक अदालत में 74,000+ मामलों का निपटारा एक दिन में हुआ।
बाध्यकारी फैसला (Final & Binding Decision)
- लोक अदालत में हुआ समझौता सिविल डिक्री के समान माना जाता है।
- इस फैसले के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती, जिससे विवाद का स्थायी समाधान हो जाता है।
प्री-लिटिगेशन मामलों का निपटारा
- जो मामले अभी अदालत में दायर भी नहीं हुए हैं (प्री-लिटिगेशन), उन्हें भी लोक अदालत में सुलझाया जा सकता है।
- इससे नए मुकदमों को जन्म लेने से रोका जा सकता है।
विशेष रूप से कमजोर वर्गों के लिए फायदेमंद
- महिलाएं, बच्चे, वृद्ध, विकलांग, SC/ST और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को विशेष प्राथमिकता दी जाती है।
- दुर्घटना पीड़ितों, बीमा क्लेम, चेक बाउंस, श्रम विवाद, विद्युत बिल, बैंक ऋण आदि मामलों में तुरंत राहत मिलती है।
सामाजिक सद्भाव और कानूनी जागरूकता
- लोक अदालत विवादों को अदालत के बाहर सुलझाने की संस्कृति को बढ़ावा देती है।
- लोगों में कानूनी जागरूकता बढ़ती है और वे छोटे-छोटे विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाने लगते हैं।
राष्ट्रीय राजस्व में वृद्धि
- बड़ी संख्या में पुराने बकाये (बिजली बिल, बैंक ऋण, टैक्स आदि) एक साथ वसूल हो जाते हैं, जैसा गिरिडीह में 12.46 करोड़ रुपये की वसूली हुई।
पर्यावरण अनुकूल न्याय
- कम कागजी कार्यवाही, कम सुनवाइयां
- कागज की बचत और समय की बचत।
लोक अदालत "जनता की अदालत" है। यह न केवल न्याय को तेज और सस्ता बनाती है, बल्कि न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास भी बढ़ाती है। विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा नियमित रूप से आयोजित की जाने वाली लोक अदालतें आज भारत में त्वरित न्याय की सबसे बड़ी उम्मीद बन चुकी हैं।
