"यह आग कब बुझेगी ?" विरोध तेज
धनबाद/केंदुआ। झारिया कोलफील्ड की सदियों पुरानी आग एक बार फिर केंदुआ (केंदुआडीह) में अपनी भयावहता दिखा रही है। मंगलवार की संध्या संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में बीसीसीएल के सीएमडी का पुतला दहन कर स्थानीय लोगों ने कंपनी की “तानाशाही और जन-विरोधी रवैये” के खिलाफ तीखा विरोध जताया। यह कार्यक्रम केंदुआ पुल के समीप आयोजित किया गया, जहां प्रदर्शनकारियों ने बीसीसीएल, डीजीएमएस और सिंफर (सीआईएमएफआर) को पूरी तरह संवेदनहीन और जन-विरोधी बताया।
बीसीसीएल सीएमडी के हालिया बयान में केंदुआ की स्थिति को “अत्यंत चिंताजनक” बताते हुए लगातार गैस रिसाव और भूधंसान की चेतावनी दी गई थी, जिसका मोर्चा ने एक स्वर में विरोध किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि कोयला निकासी के नियमों को ताक पर रखकर खदान संचालन किया जा रहा है, जिसके दुष्परिणाम अब कई क्षेत्रों में दिख रहे हैं।
सदियों पुरानी समस्या, अनसुनी चेतावनियां
झारिया कोलफील्ड में भूमिगत आग की शुरुआत 1916 में हुई थी और यह आज भी जारी है। दशकों से भूधंसान, कार्बन मोनोऑक्साइड समेत जहरीली गैसों का रिसाव और भूमि का धंसना यहां की सामान्य समस्या बन चुकी है। 2000 के दशक में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने वैज्ञानिक तरीके से गैस और आग पर नियंत्रण की संभावना जताई थी, लेकिन बीसीसीएल, डीजीएमएस और संबंधित एजेंसियों द्वारा इन सुझावों को नजरअंदाज किया जाता रहा।
दिसंबर 2025 में केंदुआडीह में गैस रिसाव की घटना ने दो महिलाओं की जान ले ली थी और दर्जनों लोग बीमार पड़े थे। इसके बाद प्रशासन और बीसीसीएल ने इलाके को खाली कराने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय लोग इसे “बेदखली की साजिश” मानते हुए विरोध कर रहे हैं। वे वैज्ञानिक समाधान (जैसे ड्रिलिंग, वेंटिलेशन और गैस निकासी) की मांग कर रहे हैं, न कि विस्थापन का।
अप्रैल 2026 में भी गैस रिसाव के बाद इलाके को सील किया गया था। बीसीसीएल ने लिक्विड नाइट्रोजन और अन्य उपायों का हवाला दिया, लेकिन निवासी कहते हैं कि समस्या जड़ से हल नहीं हो रही।
आज का विरोध और आगे की रणनीति
मोर्चा के नेताओं भगवान दास शर्मा, किशोरी प्रसाद सिंह, राहुल गुप्ता, अजीत कुमार वर्णवाल, जितेंद्र गुप्ता, मनोहर सिंह, प्रियेश गुप्ता समेत सैकड़ों स्थानीयों ने कहा कि वे बीसीसीएल की तानाशाही के खिलाफ किसी भी स्तर के आंदोलन के लिए तैयार हैं। पुतला दहन के बाद क्रमबद्ध आंदोलन की चेतावनी दी गई।
प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए — “बीसीसीएल-डीजीएमएस-सिंफर होश में आओ”
“तानाशाही नहीं चलेगी”
“लोगों को उजाड़ना बंद करो”
“एनएच-32 की सड़क तुरंत बनाओ”
झारिया मास्टर प्लान के बावजूद आग, गैस और भूधंसान की समस्या बनी हुई है। हजारों परिवार अभी भी खतरे के साए में जी रहे हैं। स्थानीय लोग अब दावा कर रहे हैं कि कोयला उत्पादन के नाम पर उनकी जिंदगी और जमीन दोनों को खतरे में डाला जा रहा है।
केंदुआ का संकट
सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि पूरे झारिया कोलफील्ड की पुरानी लापरवाही और अनियोजित खनन का जीता-जागता उदाहरण है। यदि समय रहते वैज्ञानिक और मानवीय समाधान नहीं निकाला गया तो यह आग और गैस न सिर्फ केंदुआ, बल्कि आसपास के कई इलाकों को और निगल सकती है।
झारिया कोलफील्ड की प्रमुख भूगर्भिक समस्याएं
झारिया कोलफील्ड (Jharia Coalfield) झारखंड के धनबाद जिले में स्थित भारत का सबसे पुराना और महत्वपूर्ण कोकिंग कोयला उत्पादक क्षेत्र है। खनन की शुरुआत 1894 में हुई और 1916 से यहां भूमिगत आग (underground coal fires) जल रही है, जो दुनिया की सबसे बड़ी और लंबे समय से चल रही कोयला आग की घटनाओं में से एक है। यह क्षेत्र लगभग 280 वर्ग किलोमीटर में फैला है और यहां की भूगर्भिक समस्याएं पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य तथा अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं।
भूमिगत कोयला आग (Underground Coal Fires)
1916 में पहली आग दर्ज की गई, जो ब्रिटिश काल की अवैज्ञानिक खनन प्रथाओं (खुली गैलरियां छोड़ना, खराब वेंटिलेशन) के कारण शुरू हुई थी।
सैकड़ों भूमिगत आग अभी भी जल रही हैं। आग कोयला सीम (seams) में ऑक्सीजन पहुंचने से स्वतः प्रज्वलन (spontaneous combustion) के कारण फैलती है।
लाखों टन कोयला नष्ट हो चुका है। आग से जहरीली गैसें (कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, मीथेन आदि) निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण का कारण बन रही हैं।
भूधंसान (Land Subsidence)
आग से कोयला जलने पर रिक्त स्थान (voids) बनते हैं, जिससे ऊपर की मिट्टी और चट्टानें धंस रही हैं।
सड़कें, घर, रेलवे लाइनें धंस रहे हैं। कुसुंडा, पूर्वी झारिया आदि क्षेत्रों में सबसे ज्यादा भूधंसान अबतक देखा गया (कुछ जगहों पर 20-26 सेमी या उससे अधिक)।
औसत भूधंसान दर लगभग 4 सेमी/वर्ष, कुछ खदानों में 12 सेमी/वर्ष तक हो रही है। बारिश के मौसम में यह समस्या और बढ़ जाती है।
जहरीली गैसों का रिसाव (Gas Leakage)
भूधंसान होने से जहरीली गैसों का रिसाव जारी है। इन गैसों में मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) निकलती हैं, जो बेहद ही घातक है।
2025-2026 में केंदुआडीह समेत कई जगहों पर CO रिसाव से मौतें दर्ज हुईं। भूधंसान की दरारों से गैस सतह पर आने लग जाती हैं।
इन रिसावों से लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। स्थानीय लोगों में श्वसन रोग, हृदय संबंधी समस्याएं इसी दीर्घकालिक प्रदूषण का नतीजा है।
अन्य भूगर्भिक और पर्यावरणीय समस्याएं
नतीजतन भूगर्भिक और पर्यावरणीय समस्याओं का तांता लग गया है।
आग और खनन से एसिड माइन ड्रेनेज (AMD) होता है, जिससे भूजल में भारी धातुएं (आर्सेनिक, लेड, मरकरी आदि) बढ़ गई हैं जो जल प्रदूषण का कारण है।
साथ ही जमीनों में फ्रैक्चर, क्रैक्स और थर्मल एनोमली (सतह का तापमान बढ़ना) से भूमि क्षरण हो रहा है।
इन सब कारणों से कोयला भंडार का नुकसान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। आग के कारण करोड़ों टन कोयला निकालने योग्य ही नहीं रह जाता है।
नियंत्रण और पुनर्वास के प्रयास
2009 में शुरू हुए झारिया मास्टर प्लान (Jharia Master Plan) को 2025 में पुन: संशोधित कर लागू किया जा चुका है।जिसके लिए लगभग ₹5940 करोड़ स्वीकृत है। इस मास्टर प्लान का उद्देश्य — आग नियंत्रण, भूधंसान प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और खदान क्षेत्रों का विकास करना है।
इसके तहत सतही आग प्रभावित क्षेत्र 17.32 वर्ग किमी से घटकर 1.8 वर्ग किमी रह गया है। कई परिवारों को शिफ्ट किया जा रहा है, लेकिन कार्य धीमा है। जिसे लेकर स्थानीय विरोध भी होता रहा है।
झारिया की भूगर्भिक समस्याएं दशकों की लापरवाही, अवैज्ञानिक खनन और अपर्याप्त निगरानी का परिणाम हैं। वैज्ञानिक तरीके (इनर्ट गैस इंजेक्शन, सैंड-बेंटोनाइट फ्लशिंग, थर्मल मैपिंग, InSAR/Sentinel-1 से निगरानी) से कुछ सुधार हुआ है, लेकिन पूर्ण समाधान अभी दूर है। साथ ही स्थानीय लोगों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
झारिया मास्टर प्लान को समझें
झारिया कोलफील्ड (धनबाद, झारखंड) में 1916 से भूमिगत कोयला आग जल रही है। अवैज्ञानिक खनन, भूधंसान (land subsidence) और गैस रिसाव की समस्याओं के समाधान के लिए मूल झारिया मास्टर प्लान अगस्त 2009 में मंजूर हुआ था। उसकी कुल लागत ₹7,112 करोड़ थी और कार्यान्वयन अवधि 12 वर्ष (2010-2021) थी। लेकिन लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।
2021 में इसे लेकर समीक्षा समिति गठित हुई।
और फिर आया संशोधित झारिया मास्टर प्लान (Revised Jharia Master Plan - RJMP) जिसे 25 जून 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) ने मंजूरी दी।
क्या है इसमें खास और आर्थिक प्रावधान ?
- कुल वित्तीय व्यय: ₹5,940.47 करोड़।
- कार्यान्वयन अवधि: चरणबद्ध तरीके से (Initial Phase: 31 दिसंबर 2028 तक)।
- प्राथमिकता: सबसे संवेदनशील (vulnerable) स्थानों से शुरू करके आग नियंत्रण, भूधंसान प्रबंधन और पुनर्वास।
पुनर्वास का दायरा (Rehabilitation Scope)
- प्रारंभिक चरण में 15,080 परिवारों का पुनर्वास 81 सबसे संवेदनशील साइट्स (7 Mineable + 74 Non-Mineable) से।
- BCCL परिवार: 649
- अन्य (Non-BCCL): मुख्य रूप से JRDA द्वारा।
- कुल सर्वे (2017-19) के अनुसार अभी भी लगभग 1,04,750 परिवार पुनर्वास के इंतजार में हैं, जिन्हें बाद के चरणों में शिफ्ट किया जाएगा।
- NRSC द्वारा चिन्हित 27 फायर साइट्स पर विशेष ध्यान।
कार्यान्वयन एजेंसियां
- BCCL: अपनी परिचालन क्षेत्रों (leasehold) में आग नियंत्रण, भूधंसान प्रबंधन और अपने परिवारों का पुनर्वास।
- JRDA (Jharia Rehabilitation and Development Authority): Non-BCCL परिवारों का पुनर्वास (झारखंड सरकार के अधीन)।
पुनर्वासित परिवारों के लिए सहायता
- रोजगार अनुदान (Livelihood Grant): ₹1 लाख प्रति परिवार (LTH और Non-LTH दोनों के लिए)।
- क्रेडिट सहायता: संस्थागत ऋण के माध्यम से अधिकतम ₹3 लाख तक।
- झारिया अल्टरनेटिव लाइवलीहुड रिहैबिलिटेशन फंड: आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए।
- स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम मल्टी-स्किल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट्स के साथ।
- पुनर्वास साइट्स पर पूर्ण बुनियादी ढांचा: सड़कें, बिजली, पानी, सीवरेज, स्कूल, अस्पताल, कम्युनिटी हॉल, स्किल सेंटर आदि।
आग और भूमि प्रबंधन
- BCCL द्वारा समयबद्ध तरीके से 27 फायर साइट्स पर काम।
- Coal India Ltd. (CIL) को फायर कंट्रोल और वित्तीय समायोजन की शक्ति।
- सतही आग प्रभावित क्षेत्र पहले से काफी कम हुआ है, लेकिन जड़ से समाधान पर जोर।
प्रगति अब तक
- दिसंबर 2025 में कोयला मंत्री जी. किशन रेड्डी ने धनबाद का दौरा कर प्रगति की समीक्षा की और कई प्रोजेक्ट्स (रिहैबिलिटेशन साइट्स, स्किलिंग, सोलर, ई-रिक्शा वितरण) का उद्घाटन किया।
- बेलगड़िया और करमाटांड जैसे साइट्स पर हजारों घर बन चुके हैं।
- JRDA प्रशासनिक भवन और PDS शॉप पूर्ण।
- कुल मिलाकर 2009 प्लान + Revised प्लान के तहत अब तक हजारों परिवार शिफ्ट हो चुके हैं, लेकिन कार्य अभी जारी है।
मास्टर प्लान का मकसद सिर्फ आग बुझाने और लोगों को शिफ्ट करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सस्टेनेबल आजीविका, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और मानवीय पुनर्वास पर जोर देना भी है। यह झारिया कोलफील्ड को पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित और स्थानीय विस्थापित लोगों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कवायद भी है। प्लान चरणबद्ध है, इसलिए पूर्ण सफलता समय पर निर्भर करेगी। हालांकि स्थानीय विरोध रह-रहकर उठते ही रहे हैं।
