कोल कंपनियों और रैयतों के बीच संघर्ष तेज, दलालों पर नकेल

कोल कंपनियों और रैयतों के बीच संघर्ष तेज, दलालों पर नकेल

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कंपनी और दलालों पर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

अपनी माटी बनाम कोयला कंपनियों का विकास मॉडल
बड़कागांव (हजारीबाग)। एक तरफ हरे-भरे खेत, बहु-फसली जमीन, जल-जंगल-जमीन पर टिकी पीढ़ी दर पीढ़ी की आजीविका और पूर्वजों की विरासत; दूसरी तरफ कोयला खनन कंपनियों का विशाल विकास एजेंडा, जिसमें NTPC, Adani Enterprises, JSW, NMDC और Rungta जैसी दिग्गज कंपनियां लाखों टन कोयला निकालने के लिए भूमि अधिग्रहण को तेज कर रही हैं। बड़कागांव पूर्वी क्षेत्र के गोंदलपुरा, बादम हरली, राउतपारा, अंबाजीत, बाबूपारा और आसपास के गांवों में यह द्वंद्व अब उग्र रूप ले चुका है।
कर्णपुरा घाटी (उत्तर कर्णपुरा कोलफील्ड) में विवाद नया नहीं है। 2004 में NTPC को पकरी-बरवाडीह कोयला ब्लॉक आवंटित होने के बाद से ही विरोध शुरू हो गया था। क्षेत्र में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है, जहां किसान बहु-फसली खेती, जंगल और पानी के सहारे गुजर-बसर करते हैं। कंपनियां इसे "राष्ट्रीय विकास" और ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा बताती हैं, जबकि ग्रामीण इसे अपनी अस्तित्व की लड़ाई मानते हैं।

पिछले दो दशकों में कई बार पुलिस फायरिंग, लाठीचार्ज और विवादित अधिग्रहण की घटनाएं हो चुकी हैं। ग्रामीण आरोप लगाते हैं कि फर्जी रैयत (Fake Claimants) बनाकर, दलालों के जरिए लालच देकर और कभी-कभी रात के अंधेरे में सर्वे कर जमीन हथियाने की कोशिश की जा रही है। हालिया घटनाओं में ग्रामीणों ने NTPC साइट पर फर्जी रैयतों का भंडाफोड़ किया और उनसे लिखित बयान भी लिया। 
ग्रामीण-रैयतों की ओर से मोर्चा संभाल रहे 
कर्णपुरा बचाव संघर्ष समिति का कहना है कि कंपनियां और उनके एजेंट गांववालों को आपस में लड़वा रहे हैं, जबकि असली मालिक (रैयत) अपनी विरासत कौड़ियों के भाव बेचने को मजबूर किए जा रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, जल, जंगल और जमीन उनकी है — इसे बचाना उनकी जिम्मेदारी है।

ग्रामीण बनाम कंपनियां
- ग्रामीणों का पक्ष: वे कहते हैं कि खेती उनकी पहचान है। अधिग्रहण के बाद विस्थापन, बेरोजगारी, पर्यावरणीय तबाही (धूल, पानी का प्रदूषण, जंगल की कटाई) और सांस्कृतिक विनाश होगा। वे नौकरियां, उचित मुआवजा और PESA/FRA कानून के तहत ग्राम सभा की सहमति की मांग करते हैं, जो अक्सर पूरी नहीं होती। उन्होंने दलालों और कंपनी प्रतिनिधियों के गांव में घुसने पर रोक और सामाजिक बहिष्कार का ऐलान किया है। जो माटी बेचेगा, उसे समाज से बाहर कर दिया जाएगा।

- कंपनियों का पक्ष: NTPC जैसी कंपनियां मुआवजे, रोजगार के अवसर और ऊर्जा उत्पादन के जरिए क्षेत्र के विकास का दावा करती हैं। वे कहती हैं कि कानूनी प्रक्रिया (Coal Bearing Areas Act आदि) का पालन किया जा रहा है। लेकिन ग्रामीण इसे "कानूनी खामियों" और "दबाव" का हथियार मानते हैं। Adani के गोंदलपुरा प्रोजेक्ट जैसे मामलों में दो साल से ज्यादा का सतत विरोध चल रहा है।

यह द्वंद्व सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि विकास मॉडल का है — एक तरफ छोटे किसानों की स्थानीय अर्थव्यवस्था, दूसरी तरफ बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट।

आगे की रणनीति
कर्णपुरा बचाव संघर्ष समिति ने कुछ सख्त कदम उठाए हैं।
- किसी भी कागज पर हस्ताक्षर न करने की चेतावनी।
- कंपनी और दलालों को गांव में घुसने से रोकना।
- माटी बेचने वालों का सामाजिक बहिष्कार।

साथ ही 22 मई 2026 को डीसी कार्यालय के सामने एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन का ऐलान किया गया है, जिसमें NTPC, Adani, JSW, NMDC, Rungta आदि कंपनियों के कोयला खनन प्रोजेक्ट रद्द करने की मांग होगी। समिति क्षेत्र के सभी गांवों में एकजुटता बढ़ाने और महापंचायतों के जरिए संघर्ष को और मजबूत करने की तैयारी में है।

यानी ग्रामीणों का संदेश साफ है_ "हम किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।" यह संघर्ष जारी रहेगा, क्योंकि यहां माटी सिर्फ जमीन नहीं — मां है, और मां को कोई नहीं बेचता।

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