‘येनपक कथा और अन्य कहानियां’: स्त्री-जीवन की नौ रसों वाली चुस्त पर भावनात्मक बुनावट

‘येनपक कथा और अन्य कहानियां’: स्त्री-जीवन की नौ रसों वाली चुस्त पर भावनात्मक बुनावट

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अनामिका अनु का पहला कहानी-संग्रह ‘येनपक कथा और अन्य कहानियां’ (मंजुल प्रकाशन, 2025) समकालीन हिंदी साहित्य में एक ताज़ा और संवेदनशील हस्तक्षेप है। बिहार के मुजफ्फरपुर में 1 जनवरी 1982 को जन्मी और केरल में रह रही डॉ. अनामिका अनु विज्ञान की पृष्ठभूमि (एम.एससी., पीएचडी) वाली लेखिका हैं, जिन्होंने पहले कविता से शुरुआत की। उनका काव्य-संग्रह ‘इंजीकरी’ पहले ही चर्चित हो चुका था। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (2020) और राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक पुरस्कार (2021) समेत कई सम्मानों से नवाज़ी गई अनामिका अनु अब कहानीकार के रूप में भी अपनी छाप छोड़ रही हैं।

यह संग्रह 18 कहानियों का समृद्ध संकलन है (कुल लगभग 188 पृष्ठ)। हर कहानी की नायिका एक स्त्री है और पूरा संग्रह नौ रसों (शृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत) के रंगों में बुना गया है। लेखिका ने बिहार की मिट्टी और केरल की हरियाली दोनों को अपनी भाषा में समेट लिया है। मैथिली और मलयालम के लोक-शब्दों को हिंदी की धारा में बूंद-बूंद टपकाया गया है, जो पढ़ते हुए एक अनोखा सांस्कृतिक मेल पैदा करता है।

कहानियों की दुनिया: यथार्थ, कल्पना और स्त्री-दृष्टि
अनामिका अनु की कहानियां घटना-प्रधान नहीं, बल्कि अनुभव-प्रधान हैं। दृश्य, गंध, स्पर्श, ध्वनि और स्मृति मिलकर कथा बुनते हैं। कुछ कहानियां गांव की मिट्टी से जुड़ी हैं, कुछ शहर की भीड़ में सांस लेती हैं। यथार्थ का धरातल है तो कल्पना की ऊंची छलांग भी। शीर्षक कहानी ‘येनपक कथा: बूढ़ा छाते वाला’ संग्रह की आत्मा है। इसमें पहाड़, स्त्री, बारिश और छाते के प्रतीकों के जरिए प्रेम, सुरक्षा, मातृत्व और उपभोक्तावादी संस्कृति की आलोचना की गई है। यह लोककथा-सी सहजता के साथ गहरी दार्शनिकता रखती है।

‘एक चित्रकार की वापसी’ सबसे लंबी और दार्शनिक कहानी है। नाम-रूप से मुक्त कलाकार की अनिश्चितता और रचनात्मकता को केंद्र में रखकर यह जीवन के कैनवास पर नई रंगरेखा खींचती है। ‘चितकबरी’ सफेद दाग से जुड़ी दकियानूसी असहिष्णुता से भिड़ती लड़की की कहानी है, जबकि ‘मृत पत्रकार की चिट्ठी’ स्मृति और पिता-पुत्र संबंध की कोमलता को छूती है। ‘दृगा लिखती है’, ‘स्वीटी की अम्मा’, ‘थोड़ा-सा सुख’, ‘ग्रीन विलो’, ‘हवाई चप्पल’ और ‘भीगे तकिए धूप में’ जैसी कहानियां स्त्री-मन की आकांक्षाओं, स्वप्नों, संघर्षों, कामनाओं और अवसाद से जिरह करती हैं।

ये कहानियां पितृसत्ता की सूक्ष्म आलोचना भी करती हैं। स्त्रियां यहां न पीड़िता हैं, न आदर्श नायिकाएं — वे बौद्धिक, निर्णय लेने वाली, कभी चुपचाप लौट जाने वाली और कभी विद्रोह करने वाली हैं। प्रेम, वियोग, मोह-माया, नैतिकता, ऐंद्रिकता, क्लिष्टता, निष्ठुरता, साहस और सौंदर्य — हर रस इनमें जीवंत है।

भाषा-शैली: कविता की लय और कहानी का प्रवाह
अनामिका अनु की भाषा कविता-सी तरल है। शब्दों में लय है, बिंबों में गहराई। साधारण जीवन के भीतर छुपी असाधारण संवेदनाओं को वे बड़े कलात्मक ढंग से पिरोती हैं। इनमें कोमल भावनाओं, भोले विश्वासों, गहरी आस्थाओं और खुरदुरी सच्चाइयों के बीच संवाद है जो लोक-गाथा जैसा जादू पैदा करता है।

साहित्य अकादमी पुरस्कृत लेखिका डॉ. बिंदु भट्ट अपनी समीक्षा में इसे “समकालीन स्त्री-अनुभव का आत्मिक विस्तार” बताती हैं। वे लिखती हैं कि कहानियां फणीश्वरनाथ रेणु की ‘ठुमरी’ की याद दिलाती हैं।

क्यों पढ़ें यह संग्रह?
‘येनपक कथा और अन्य कहानियां’ सिर्फ कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना का दस्तावेज़ है। यह दिखाता है कि कोमलता और दृढ़ता, अधैर्य और धैर्य, सपने और संघर्ष एक साथ कैसे चलते हैं। आज के उपभोक्तावादी, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में ये कहानियां पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं।

अगर आप ऐसी कहानियां पसंद करते हैं जो मन को छू जाएं, स्मृतियों को जगाएं और जीवन की सूक्ष्म सच्चाइयों को उजागर करें, तो यह संग्रह आपके लिए ही है। अनामिका अनु ने साबित कर दिया है कि कविता से कहानी की ओर बढ़ते हुए भी उनकी रचनात्मकता उतनी ही संवेदनशील और शक्तिशाली है।

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