ग्लोबल वार्मिंग पर अब एक नए अध्ययन ने हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया है !

ग्लोबल वार्मिंग पर अब एक नए अध्ययन ने हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया है !

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लाखों साल पहले उत्तर की ठंडी जगहें इतनी गर्म नहीं थीं, जितना पहले लोग सोचते थे !

Vl live Desk । साइंटिस्ट आज के मौसम बदलाव को समझने के लिए पुराने समय को देखते हैं। आज हवा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस (जिसे हम CO₂ कहते हैं) बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसे समझने के लिए वैज्ञानिक 2 करोड़ 30 लाख साल पहले से 50 लाख साल पहले के समय को देखते हैं। इस समय को मियोसीन युग कहा जाता है। उस समय हवा में CO₂ की मात्रा आज जितनी ही थी – यानी 400 से 600 पीपीएम के बीच। 

पहले वैज्ञानिक सोचते थे कि उस पुराने समय में उत्तर की ऊंची ठंडी जगहें (जैसे उत्तर अटलांटिक महासागर) बहुत-बहुत गर्म थीं। वे कहते थे कि वहां गर्मी इतनी ज्यादा थी कि ठंडी जगहें और गर्म जगहों के बीच का फर्क लगभग खत्म हो गया था। लेकिन अब एक नई स्टडी आई है जिसने सब कुछ बदल दिया है।

9 दिसंबर 2025 को Nature Communications नाम की बड़ी वैज्ञानिक पत्रिका में यह शोध छपा है। इस शोध में वैज्ञानिकों की टीम ने कहा है कि उत्तर की ऊंची जगहों में गर्मी उतनी ज्यादा नहीं थी ! असल में तापमान पहले के अनुमान से करीब 9 डिग्री सेल्सियस कम था। यानी हमारी पुरानी धारणा गलत थी।

वैज्ञानिकों ने कैसे पता लगाया?

समुद्र में बहुत छोटे-छोटे जीव रहते हैं जिन्हें कोकोलिथोफोर्स कहते हैं। ये जीव मरने के बाद अपने शरीर के सूक्ष्म कैल्साइट प्लेट्स (बहुत छोटे-छोटे पत्थर जैसे टुकड़े) छोड़ जाते हैं। इन्हें कोकोलिथ कहते हैं। ये टुकड़े समुद्र के नीचे जमा होकर लाखों-करोड़ों साल तक सुरक्षित रहते हैं। 


शोधकर्ताओं ने इन्हीं पुराने कोकोलिथ को लिया। वे उत्तर अटलांटिक महासागर के 57 डिग्री उत्तरी अक्षांश (बहुत ऊंची ठंडी जगह) से 16 मिलियन साल पुराने समुद्री मिट्टी के नमूने लाए। इन नमूनों से उन्होंने 90% से ज्यादा शुद्ध कोकोलिथ निकाले। इसके लिए उन्होंने खास फिल्टर मशीन और सेंट्रीफ्यूज (घुमाने वाली मशीन) बनाई। पहले कभी इतनी साफ-सुथरी तरीके से इन टुकड़ों की जांच नहीं हुई थी।

फिर उन्होंने क्लंप्ड आइसोटोप थर्मोमेट्री नाम की नई और आसान तरीके वाली मशीन का इस्तेमाल किया। इस तरीके में वे देखते हैं कि जीवाश्म में ऑक्सीजन और कार्बन के भारी परमाणु कैसे जुड़े हैं। इससे सीधे तापमान पता चल जाता है। यह पुराने तरीकों से बेहतर है क्योंकि यह समुद्री पानी की रसायन पर निर्भर नहीं करता। पुराना तरीका (अल्केनोन इंडेक्स) गलत अनुमान दे रहा था।

नतीजतन! पुराने अनुमान से तापमान 9 डिग्री कम निकला। मियोसीन के बीच के समय में सबसे ज्यादा तापमान 18.3 डिग्री सेल्सियस (± 5 डिग्री) था। पहले लोग इसे बहुत ज्यादा गर्म बता रहे थे। नया रिकॉर्ड अब जलवायु कंप्यूटर मॉडल से बिल्कुल मैच कर रहा है।

मुख्य वैज्ञानिक डॉ. लूज मारिया मेजिया क्या कहती हैं ?
शोध की मुख्य लेखिका डॉ. लूज मारिया मेजिया ब्रेमेन यूनिवर्सिटी (जर्मनी) के MARUM सेंटर में काम करती हैं। वे कहती हैं, “मियोसीन युग की जलवायु को समझना हमें आज के इंसान द्वारा पैदा की गई CO₂ बढ़ोतरी के भविष्य को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगा।”

वे आगे बताती हैं, “पुराने तरीके से ऊंची ठंडी जगहों को ‘बहुत ज्यादा गर्म’ दिखाया गया था। इससे लगता था कि CO₂ बढ़ने पर पूरा महासागर एक समान ‘गर्म सूप’ बन जाएगा। लेकिन मैंने कैरिबियन समुद्र में समुद्री जीवों का अध्ययन किया। वहां 28-30 डिग्री तापमान में भी ज्यादातर जीव संघर्ष करते हैं। तो लाखों साल तक ठंडी जगहों में इतना गर्म पानी कैसे संभव था? यह सवाल मेरे दिमाग में था।”

इस अध्ययन ने पहली बार साफ-साफ दिखाया कि मियोसीन युग में उत्तर की जगहों पर गर्मी बढ़ोतरी मध्यम (modest) थी, न कि बहुत चरम। इससे ठंडी और गर्म जगहों के बीच तापमान का फर्क भी कंप्यूटर मॉडल से मैच करता है।

भविष्य के लिए क्या मतलब है ?
यह नई खोज बहुत महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि मियोसीन युग में उत्तर की ऊंची जगहों का तापमान पहले जितना चरम (बहुत ज्यादा) नहीं था। इसलिए भविष्य में भी CO₂ बढ़ने पर वहां गर्मी उतनी भयंकर नहीं हो सकती जितना पहले हम सोचते थे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु जांच के पुराने तरीकों (प्रॉक्सी) को बार-बार दोबारा जांचना बहुत जरूरी है। ताकि लंबे समय के ट्रेंड और सही तापमान दोनों सही समझ आएं।

डॉ. मेजिया साफ कहती हैं, “यह अध्ययन सिर्फ शुरुआत है। हमें और ज्यादा परीक्षण करने की जरूरत है।”

यानि अब हमारा अगला कदम होगा_ दुनिया के दूसरे-दूसरे इलाकों और अलग-अलग अक्षांशों (लैटिट्यूड) से और फॉसिल कोकोलिथ लेकर जांच करना। इससे अतीत की जलवायु की पूरी तस्वीर बन सकेगी।

यह खोज न सिर्फ पुरानी सोच को तोड़ती है, बल्कि भविष्य के लिए थोड़ी उम्मीद भी देती है। बढ़ते CO₂ के बावजूद उत्तर की ठंडी जगहें शायद पहले जितनी डरावनी गर्मी नहीं झेलेंगी।

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