“औरत क्या ही कर लेगी?”_ हेमलता ने बताया।

“औरत क्या ही कर लेगी?”_ हेमलता ने बताया।

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जयपुर की सड़कों पर साहस की मिसाल_
पहली महिला ऑटो-रिक्शा ड्राइवर हेमलता की प्रेरणादायक कहानी


विलेज लाइन लाइव | स्टोरी_ सफ़र ज़िन्दगी

जयपुर । जब ज्यादातर महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों में उलझी रहती हैं, तब हेमलता कुशवाहा ने न सिर्फ अपनी जिंदगी संभाली, बल्कि पूरे शहर की सड़कों पर एक नई मिसाल कायम की। वे जयपुर की पहली महिला ऑटो-रिक्शा ड्राइवर हैं, जो पति के अत्याचार से तंग आकर घर छोड़ने के बाद खुद की कमाई से बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं। आज वे न सिर्फ परिवार का गुजारा कर रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी सशक्त बनाने का संदेश दे रही हैं।

संघर्ष से शुरू हुई कहानी

हेमलता का बचपन और जवानी दोनों ही चुनौतियों से भरा रहा। घर की माली हालत बस मुश्किल से गुजारे लायक ही थी। शादी हुई पर  पति शराबी, निकम्मा और मारपीट करने वाले निकला। उसने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं, इक झगड़े में पति ने हेमलता को घर की पहली मंजिल से नीचे पटक दिया और हमेशा के लिए छोड़ गया। हेमलता ने चुप रहकर सब कुछ सहना मंजूर नहीं किया। उन्होंने घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया और तलाक के मुकदमे में भी लड़ाई लड़ी। कोर्ट-कचहरी, वकील की फीस और बच्चे की देखभाल – सब कुछ अकेले संभालना पड़ा। इस दौरान हेमलता ने जीवन का सबसे बड़ा सबक भी मिला कि अगर ज़िदा रहना है तो कड़ी मेहनत के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। 

ट्रेनिंग और नया मोड़
2012 में हेमलता ने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया। भाई के ऑटो से प्रैक्टिस शुरू की। लेकिन कोई उन्हें हायर नहीं कर रहा था। 2013 में आजाद फाउंडेशन ने उन्हें ट्रेनिंग का मौका दिया। सिर्फ ड्राइविंग नहीं, बल्कि महिलाओं की स्थिति, हिंसा से बचाव, सेल्फ-डिफेंस और आत्मविश्वास पर पूरा कोर्स। यह ट्रेनिंग उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई।  

2014 में  बैंक से लोन लेकर उन्होंने अपना ऑटो खरीद लिया। जयपुर के स्टेशन के पास पार्किंग करके यात्री ढोने लगीं। शुरू में पुरुष ड्राइवरों ने विरोध किया, ताने मारे, लेकिन हेमलता ने हार नहीं मानी। उन्होंने जयपुर मेट्रोपॉलिटन ऑटो-ड्राइवर्स ट्रेड यूनियन में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में वह सेक्रेटरी भी बनीं।

आज की जिंदगी और उपलब्धियां
हेमलता ने दूसरी शादी की। उसके एक लड़का और इक 5 साल की बच्ची भी है। सुबह बच्चों को स्कूल छोड़कर हेमलता ऑटो लेकर निकल जाती हैं। दिन भर 8-10 घंटे ऑटो चलाती हैं। डीजल और किश्त कटने के बाद भी रोज ₹1000-1200 की कमाई हो जाती है। शाम को बच्चों को पति के पास छोड़कर फिर काम पर। थकान भले ही हो, लेकिन आत्मसम्मान की खुशी अलग है।  

कोरोना महामारी के दिनों को याद करके वह आज भी भावुक हो जाती हैं। सब सारे जमा पैसे खत्म हो चुके थे और वह गर्भवती थी। पर किसी ने उसकी मदद नहीं की। लेबर पेन शुरू हो गया वह खुद ऑटो चलाकर अस्पताल पहुंची और बच्ची को जन्म दिया । ऐसे समय में भी हेमलता की मदद किसी ने नहीं की, यहां तक कि उसके परिवार के लोगों ने भी साथ छोड़ दिया था। परिवार का कोई भी सदस्य उसे और बच्ची को अस्पताल में देखने तक नहीं पहुंचा। लेकिन अब वह इन सब चीजों और बीते बुरे दौर की यादों से काफी आगे आ चुकी हैं। 

वे कहती हैं,  
“अगर मुझे अपनी जिंदगी बदलनी है तो मुझे खुद से शुरू करना होगा। मैं हार मानने वाली नहीं हूँ, लड़ूंगी।”

और आगे जोड़ती हैं,  
“जब लोग महिलाओं को ऑटो चलाते देखने के आदी हो जाएंगे, तो सम्मान बढ़ेगा। महिलाएं भी खुद पर भरोसा करने लगेंगी।”

हेमलता अब भारी वाहन लाइसेंस भी ले चुकी हैं। उनका सपना है – ट्रक या बस चलाना, ताकि और ज्यादा महिलाएं सड़कों पर सुरक्षित महसूस करें। वे पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मिल चुकी हैं और ड्राइवरों की समस्याओं (छाया, पानी, सुरक्षा) पर आवाज उठा चुकी हैं।

हेमलता की मिसाल ने रास्ता दिखाया 
पिंक सिटी रिक्शा कंपनी की महिला ड्राइवरें
हेमलता की कहानी ने जयपुर की सैकड़ों महिलाओं को प्रेरित किया। 2017 में ACCESS डेवलपमेंट सर्विसेज (एक गैर-लाभकारी संस्था) ने पिंक सिटी रिक्शा कंपनी शुरू की। यह देश की पहली ऑल-वुमन ई-रिक्शा कंपनी है, जो कम आय वाले परिवारों की 200 से ज्यादा महिलाओं को ट्रेनिंग, रोजगार और स्वामित्व दे रही है। ये महिलाएं कस्टम-डिज़ाइन किए गए गुलाबी ई-रिक्शा चलाती हैं, पर्यटकों को जयपुर घुमाती हैं और खुद को शेयरहोल्डर बनाकर कंपनी की मालिक भी बन चुकी हैं। ट्रेनिंग में ड्राइविंग, मैकेनिकल रिपेयर और आत्मविश्वास शामिल है। कई महिलाएं अब अपनी रिक्शा खरीदकर उद्यमी भी बन गई हैं।
रेनू शर्मा_ कंपनी की पहली बैच की ड्राइवरों में से एक हैं। पहले परिवारवालों ने विरोध किया । फिर रेनू ने समझाया कि दूसरे के लिए सुबह से शाम तक कम पैसे में काम करने के बजाय, अब वह अपने घंटे चुन सकती है, अच्छी सैलरी कमा सकती हूँ और परिवार संभाल सकती है। आज उनका परिवार खुश है। 
वे कहती हैं-  “असाइनमेंट ऑनलाइन मिलता है, घंटे लचीले हैं – परिवार और काम दोनों संभल जाते हैं।”

नजमा बानो (46 वर्ष, शिवाजी नगर स्लम)_ चार बच्चों की मां हैं। पहले सिर्फ लाह की चूड़ियां बनाकर कुछ कमाई कर पाती थीं। साथ ही पति की साइकिल रिपेयर दुकान में कुछ समय दिया करती थीं। शिक्षा कम होने और उम्र ज्यादा होने के कारण शुरू में लोगों ने उन्हें मना किया गया, लेकिन उनकी “दृढ़ता” ने सबको प्रभावित किया। बच्चों का साथ मिला पर समुदाय ने किनारा रखा। आज वे ट्रेनर हैं, अन्य ड्राइवरों के बीच सम्मानित और पर्यटकों को अपनी नरम आवाज में स्वतंत्रता व नारी हौसले का संदेश देती हैं।

अनीता महावर (25 वर्ष, काला हनुमान कछी बस्ती)_ मास्टर्स डिग्री धारक हैं और पिता मजदूर हैं। पहले होम गार्ड्स में काम किया, आमेर किले पर पर्यटकों की देखभाल करती थीं। साइकिल भी नहीं चलाई थी, लेकिन पिंक सिटी रिक्शा कंपनी की अवधारणा समझते ही ट्रेनिंग ली। आज शेयरहोल्डर हैं, बड़े ग्रुप्स लीड करती हैं, जयपुर की संकरी गलियों में ट्रैफिक संभालती हैं और गर्व से शहर दिखाती हैं। वे अन्य महिलाओं को प्रेरित करती हैं कि यह अतिरिक्त आय का बेहतरीन विकल्प है।

प्रेरणा का संदेश

हेमलता कुशवाहा और पिंक सिटी रिक्शा की ये महिला ड्राइवर साबित करती हैं कि सड़कें सिर्फ पुरुषों की नहीं। चाहे पारंपरिक ऑटो हो या ई-रिक्शा – महिलाएं जब ड्राइवर बनती हैं, तो न सिर्फ परिवार का गुजारा चलता है, बल्कि पूरी पीढ़ी को आत्मविश्वास मिलता है। ये कहानियां उन लाखों महिलाओं के लिए उम्मीद हैं जो कहती हैं, “औरत क्या कर लेगी?” जवाब है – औरत सब कर लेती है, बस इरादा मजबूत होना चाहिए।

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